क्या आप लेते हैं Vitamin-P ?
जानें क्यों है ये सेहत के लिए जरूरी
चंडीगढ़, 1 मार्च (विश्ववार्ता) विटामिन पी को फ्लेवोनॉयड के रूप में जाना जाता है। यह सच में विटामिन नहीं है बल्कि एंटीऑक्सीडेंट और सूजन रोधी गुणों वाले फाइटोन्यूट्रिएंट्स का एक वर्ग है. यह आमतौर पर पौधों पर आधारित खाद्य पदार्थ में पाए जाते हैं और इससे कई सारे स्वास्थ्य लाभ जुड़े होते हैं. आपको बता दें कि यह फ्लेवोनॉयड फलों और सब्जियों को रंग देने के लिए जरूरी होता है. साल 1930 में वैज्ञानिकों ने पहली बार संतरे के फल से फ्लेवोनॉयड निकला था उस समय इसे विटामिन समझा जा रहा था. इसी वजह से इसका नाम विटामिन पी पड़ा. हालांकि अब यह विटामिन नहीं माना जाता है।
विटामिन पी दिल के सेहत के लिए काफी फायदेमंद है. विटामिन पी युक्त आहार का सेवन करने से ब्लड वेसल्स अच्छे से कम करना शुरू करता है और इससे दिल को काफी फायदा पहुंचता है दिल की बीमारियों का रिस्क भी काफी कम होता है.
विटामिन पी एक एंटीऑक्सीडेंट के रूप में काम करता है जो हानिकारक मुक्त कणों को बेअसर करने में मदद करता है. यह कोशिकाओं को नुकसान पहुंचा सकते हैं और प्रतिरक्षा प्रणाली को कमजोर कर सकते हैं. इसके अलावा कई क्रॉनिक बीमारियां भी इसके कारण हो सकती है।
इसमें सूजन रोधी गुण होते हैं जो सूजन को कम करने और गठिया एलर्जी और अस्थमा जैसी स्थितियों से जुड़े लक्षणों को कम करने में मदद कर सकते हैं। विटामिन पी स्किन के लिए लाभदायक है. इससे वेरीकोज वेन जैसी समस्या का रिस्क काफी हद तक कम होता है।
लेकिन यही अगर ठीक से काम करे तो सेहत पर सकारात्मक असर पड़ता है। जब हम भोजन का स्वाद सुख उठाते हैं तो डोपामाइन एक्टिव हो जाता है इससे जो आनंद की अनुभूति होती है जो भोजन को आसानी से पचाने में मदद करता है।
2020 में (एनएलएम में छपी है) भोजन के आनंद और स्वस्थ आहार के बीच संबंध को लेकर 119 अध्ययनों की समीक्षा की गई। सत्तावन प्रतिशत अध्ययनों में खाने के आनंद और आहार संबंधी परिणामों के बीच अनुकूल संबंध पाया गया।
उदाहरण के लिए, 2015 के एक अध्ययन में भोजन के प्रति अधिक आनंद को उच्च पोषण स्थिति के साथ जोड़ा गया है। कुछ अध्ययन पौष्टिक, संतुलित आहार को बढ़ावा देने के लिए स्वस्थ खाद्य पदार्थों का आनंद लेने के महत्व पर जोर देते हैं।
संस्कृत का बेजोड़ सूक्त है- संतोषम परम सुखम। भोजन के मामले में कहें तो जब हम वह खाते हैं जिसमें हमें रस मिलता है तो संतुष्टि का लेवल बढ़ जाता है, आहार की गुणवत्ता में सुधार होता है और अधिक खाने या अत्यधिक खाने की संभावना से हम बच जाते हैं।